पूरे देश में 9 अगस्त से अंग्रेजों भारत छोड़ों की लहर थी। इस विरोध को दबाने के लिए अंग्रेजों ने हिंसा का सहारा लिया। बावजूद इसके यह आंदोलन जिसे बाद में अगस्त क्रांति के नाम से जाना गया रुक नहीं रहा था।

रायबरेली में भी देश के अन्य भागों की तरह यह आंदोलन अपने चरम पर था। जगह जगह लोग आंदोलन कर रहे थे। तिरंगा लिए हुए लोगों की भीड़ प्रतिरोध के बावजूद निकल रही थी। इस आंदोलन को धार देने के लिए नेता लगातार रणनीति तैयार कर रहे थे।

11 अगस्त 1942 को एक बैठक सरेनी बाज़ार में बाबु गुप्तार सिंह के नेतृत्व में हुई। जिसमें तय किया गया कि सरेनी थाना भवन पर 30 अगस्त को तिरंगा फहराया जाएगा।इसमें लोगों को भारी संख्या में लाने की तैयारी थी।

नेताओं का निर्देश था कि एक रणनीति के तहत सभी लोग थाना परिसर में इकट्ठा होंगे और 30 अगस्त को तिरंगा फहराया जाएगा। इसके लिए गांव-गांव गुप्त बैठकों का दौर शुरू हुआ। अंग्रेजों तक यह बात पहुंची तो इन बैठकों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी। लोगों को उनके घरों से उठाया जाने लगा।युवाओं की धरपकड़ होने लगी जिससे यह आक्रोश और तेज होकर आंदोलन को धार देने लगा। क्षेत्र के प्रमुख नेता गुप्तार सिंह सहित कई लोग भूमिगत हो गए।

युवाओं के खून से लाल हुआ थाना :

इन्ही उत्पीड़न से तंग आकर युवाओं ने आरपार की लड़ाई का निश्चय किया। 18 अगस्त को क्षेत्र के बड़ी संख्या में युवा सरेनी बाज़ार में इकट्ठा होने लगे और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। युवाओं को आतंकित करने के लिए पुलिस ने एक चाल चली और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सूरज प्रसाद त्रिपाठी को मंच से ही गिरफ़्तार कर हवालात में बंद कर दिया। इससे भीड़ और आक्रोशित हो गई औऱ सरेनी थाने पर धावा बोल दिया। तत्कालीन थानेदार बहादुर सिंह ने बिना कुछ सोचे और निहत्थे युवाओं पर फ़ायरिंग का आदेश दे दिया। थाना परिसर में ही गोलाबारी में युवाओं की लाशें बिछ गई।

जो कि बाद में सरेनी गोलीकांड के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अंग्रेजों ने इसके बाद भी गांव-गांव छापा मारकर युवाओं को पकड़ा, घरों में लूटपाट की और जमकर यातना दी। बावजूद इसके किसी का जोश कम नहीं हुआ। पुलिस की गोलाबारी में गौतमन खेड़ा के औदान सिंह, सरेनी के सुक्खू सिंह, मानपुर के रमाशंकर द्विवेदी, सुरजीपुर के टिर्री सिंह, हमीरगांव के चौधरी महादेव सहित पांच क्रन्तिकारी युवा शहीद हो गए और बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए। थाने के सामने ही शहीदों की याद में एक स्मारक बनाया गया है और प्रति वर्ष 18 अगस्त को श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार व लोकतंत्र सेनानी केबी सिंह के अनुसार इस गोली कांड से आंदोलन दबने के बजाय और तेज हुआ और पूरे जिले में फ़ैल गया। जिसमें बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।

अगस्त क्रान्ति

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