समाज को समर्पित डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन

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Dr. sarvapalli Radhakrishnan

आज़ाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan) को उनके महान कार्यों के लिए जाना जाता है। वह भारतीय संस्कृति के संवाहक और आस्थावान हिंदू विचारक थे।

उनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है। बीसवीं सदी के विद्वानों और महापुरुषों में उनका नाम सबसे उपर आता है।

उन्होंने हिंदू धर्म को भारत और पश्चिम दोनों में फ़ैलाने का प्रयास किया, वह दोनों सभ्यता को मिलाना चाहते थे। डॉ राधाकृष्णन विवेकानंद और वीर सावरकर को अपना आदर्श मानते थे। वह एक शिक्षक, दार्शनिक, दूरदर्शी और समाज सुधारक थे।

वह दर्शनशास्त्र का बहुत ज्ञान रखते थे और उन्होंने भारतीय दर्शनशास्त्र में पश्चिमी सोच की शुरुआत भी की थी।

जीवन परिचय (Dr Sarvepalli Radhakrishnan Life introduction)-

डॉ राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के छोटे से गांव तिरुमनी के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली विरास्वामी था, वह एक विद्वान ब्राह्मण थे और राजस्व विभाग में कार्य करते थे।

उनके पिता पर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी, जिसकी वजह से राधाकृष्णन को बचपन से ही ज़्यादा सुख सुविधा नहीं मिल पाई थी।

उनका का बचपन गाँव में ही बीता था। उनके पाँच भाई और एक बहन थी, जिनमें उनका दूसरा स्थान था।

वर्ष 1903 में डॉ राधाकृष्णन का विवाह अपनी दूर की बहन सिवाकामू से साथ हुआ था। विवाह के समय उनकी उम्र महज़ 16 वर्ष थी और उनकी पत्नी की उम्र मात्र 10 वर्ष थी। उनकी पत्नी ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन तेलुगू भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी।

वर्ष 1908 में इन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया। वर्ष 1956 में डॉ राधाकृष्णन के पत्नी की मृत्यु हो गई। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व महान खिलाड़ी वीवी एस लक्ष्मण डॉ राधाकृष्णन के खानदान से ताल्लुक रखते हैं।

हर वर्ष डॉ राधाकृष्णन के जन्मदिन पर उनकी याद में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उनका मानना था कि शिक्षकों का दिमाग देश में सबसे अच्छा होना चाहिए।

उनका कहना था कि देश के शिक्षक राष्ट्रनिर्माण में महतवपूर्ण भूमिका निभाते हैं. देश के भविष्य की नीव शिक्षकों के द्वारा मजबूत की जा सकती है।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की शिक्षा (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Education)-
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचपन से मेधावी छात्र थे। उनका बचपन तिरुमनी गांव में व्यतीत हुआ था, इसलिए उन्होंने वहीं से अपनी शिक्षा की प्रारंभ की।

उनके आगे की शिक्षा के लिए उनके पिता ने क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में दाखिला करा दिया, जहां वह 1896 से 1900 तक पढ़े। वर्ष 1900 में वह वेल्लूर चले गए, जहाँ उन्होंने वर्ष 1904 तक शिक्षा ग्रहण की।

वर्ष 1902 में इन्होने मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसके लिए इन्हें छात्रवृति भी प्रदान की गयी थी।इस दौरान उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता प्राप्त हुई थी।

उन्होंने 1906 में दर्शन शास्त्र में M.A किया था, डॉ राधाकृष्णन को अपने पुरे जीवन में शिक्षा के क्षेत्र में स्कालरशिप मिलती रही थी।

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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का राजनीतिक करियर (Sarvepalli Radhakrishnan Political Career)-

जब भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया, कि वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें।नेहरूजी की बात को स्वीकारते हुए डॉ.राधाकृष्णन ने 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया।

संसद में सभी लोग उनके कार्य और व्यव्हार की बेहद प्रंशसा करते थे। अपने सफल अकादमिक कैरियर के बाद उन्होंने राजनीतिक में अपना कदम रखा| जिसके बाद 13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक वह देश के उपराष्ट्रपति रहे।

उनको उपराष्ट्रपति बनायें जाने से सभी अन्य नेता हतप्रभ थे, परन्तु अपने कार्यों से डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को गलत साबित कर दिया और 13 मई 1962 को ही वह भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।

राजेंद्र प्रसाद की तुलना में उनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था, क्योंकि जहां एक ओर भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए.

जिसमें चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा. वही दूसरी ओर दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इन्हीं के कार्यकाल के दौरान ही हुआ था।

डॉ.राधाकृष्णन को मिले सम्मान, अवार्ड व किताबें (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Awards And Books)

शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए डॉ. राधाकृष्णन को सन 1954 में सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया।

1962 से राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्म दिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई।

वर्ष 1962 में डॉ. राधाकृष्णन को “ब्रिटिश एकेडमी” का सदस्य बनाया गया।
पोप जॉन पाल ने इनको “गोल्डन स्पर” भेट किया।
इंग्लैंड सरकार द्वारा इनको “आर्डर ऑफ़ मेंरिट” का सम्मान प्राप्त हुआ।

राधाकृष्णन को मरणोपरांत 1975 में अमेंरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है।

इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे।

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन शास्त्र एवं धर्म के उपर अनेक किताबें लिखी जैसे “गौतम बुद्धा: जीवन और दर्शन” , “धर्म और समाज”, “भारत और विश्व” आदि। वह अक्सर किताबें अंग्रेज़ी में लिखते थे।

1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉ राधाकृष्णन ने देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था, कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे और बतौर राष्ट्रपति वह उनका आखिरी भाषण रहा था।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु

17 अप्रैल 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद डॉ राधाकृष्णन का निधन हो गया। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद किया जाता है। इसलिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाकर डॉ.राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।

इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरुस्कार प्रदान किए जाते हैं।

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