MODI 2.0 : CAA/NRC, धारा 370, राम मंदिर, किसान आंदोलन, कोरोना

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modi-2.0 report card
Image: Rashtrahit Media

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल को सात साल हो चुके हैं। वे दो साल पहले आज ही के दिन 30 मई 2019 को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। तो चलिए आज कुछ ऐसे मुख्य मामलों की बात करते हैं जो कि मोदी सरकार में हुए।

धारा 370 :

बात उन दिनों की है जब नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने और अमित शाह दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री बने। गृहमंत्री अमित शाह ने गृहमंत्री बनने के बाद पहले दौरे के लिए जम्मू- कश्मीर को चुना। यहां उन्होंने गांव के सरपंचों, व्यापारियों, अफसरों, पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात की। तीन दिन के दौरे में अमित शाह ने अफसर, व्यापारी, पार्टी कार्यकर्ता और सरपंचों से मिलने के बाद ये तय कर लिया कि अब कश्मीर बड़े बदलाव के लिए तैयार है।

इसकी कहानी तब लिख गई थी जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा अकेले 303 सीटें जीत कर आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष (तत्कालीन) व गृह मंत्री अमित शाह ने इस प्रचंड बहुमत को दूसरी तरह से देखा। उन दोनों का मानना था कि जब पुलवामा के आतंकी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया गया तो देश की जनता ने भाजपा को दोबारा इसलिए ज़्यादा बहुमत दिया ताकि जम्मू-कश्मीर की समस्या का स्थाई समाधान हो सके।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों का मानना था कि कश्मीर की समस्या स्थानीय लोग नहीं हैं वहां पर हो रही गतिविधियों के ज़िम्मेदार वहां की जनता नहीं बल्कि नेतागिरी है और इसमें अलगाववादी के अलावा मुख्यधारा के नेता भी शामिल हैं। इसलिए कश्मीर समस्या का इलाज कहीं और ढूढने की ज़रूरत नहीं थी इसका इलाज बड़े प्रशासनिक बदलाव करके किये जा सकते हैं लेकिन ये प्रशासनिक बदलाव स्थाई प्रकृति के होने चाहिए।

इससे पहले मोदी सरकार अलगाववादियों की कमर आर्थिक और राजनीतिक तौर पर तोड़ चुकी थी। कमज़ोर हो चुके अलगाववादी इस बात की निशानी थे कि अब कश्मीरी जनता का समर्थन अलगाववादियों को नहीं मिल रहा था और इधर केंद्र सरकार ने सरपंचों को मजबूत करने का काम शुरू कर दिया था। केंद्र की योजनाओं का पैसा जो राज्य सरकार के ज़रिए सरपंचों को दिया जाता था अब केन्द्र सरकार ने वो पैसा सीधे सरपंचों को देना शुरू कर दिया था। पैसा सीधे गांव के विकास में लगाया जा रहा था इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो रहे थे।

राज्य में कानून व्यवस्था बेहतर हो इसके लिए छोटे-से-छोटे इनपुट पर एक्शन लेने को कहा गया। शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए संसाधनों की कमी पूरी करने की गारंटी दी गयी। अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई गयी। बिल पास कराने के लिए बहुमत की आवश्यकता थी जिसके लिए दिल्ली में नरेंद्र तोमर, प्रह्लाद जोशी, भूपेंद्र यादव, पीयूष गोयल और धर्मेंद्र प्रधान को राज्य सभा में नंबर मैनेजमेंट और दूसरी पार्टियो के इच्छुक सांसदों को बीजेपी में लाने की ज़िमेदारी दी गयी।

मकसद यह बताया गया कि तीन तलाक जैसे बिलों को पास कराना और राज्यसभा में बहुमत हासिल करना है लेकिन किसी को नहीं पता था कि ये सब धारा 370 और कश्मीर के बड़े प्लान के लिए किया जा रहा है। इस पूरे प्लान के बारे में अमित शाह, नरेंद्र मोदी और कुछ आरएसएस कार्यकर्ताओं को पता था लेकिन यह प्लान काम कैसे करेगा इसका पता सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ही था। अमित शाह की बनाई टीम ने संविधान का अध्यन किया और पुराने संविधान संशोधन और उनके इतिहास को खंगाला जिसके बाद शाह इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि धारा 370 को खत्म करने के लिए किसी असाधारण या दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता नहीं है।

अरुण जेटली सहित तमाम कानून और संविधान के जानकारों से सलाह मशविरा किया गया और आखिर में औपचरिक रूप से कानून मंत्रालय की राय भी ली गयी। सोमवार को जब कैबिनेट में ये प्रस्ताव आना था उससे 12 घंटे पहले कानून मंत्रालय से भी राय ली गई।

आखिरकार सरकार ने जम्मू- कश्मीर से न केवल धारा 370 के विवादित प्रावधान खत्म कर दिए बल्कि जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित राज्यों में बाँट दिया। अब पुराना जम्मू-कश्मीर इतिहास की बात हो गई है, अब कश्मीर में वो कानून लागू है जो पूरे हिंदुस्तान में लागू है।

राम मंदिर :

Ram Mandir, Ayodhya

राम मंदिर के इतिहास में 5 अगस्त 2020 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। 1528 से लेकर 2020 तक यानी 492 साल के इतिहास में कई मोड़ आए। कुछ मील के पत्थर भी पार किए गए। खास तौर से 9 नवंबर 2019 का दिन जब 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने ऐतिहासिक फैसले को सुनाया। अयोध्या जमीन विवाद मामला देश के सबसे लंबे चलने वाले केस में से एक रहा।

• साल 1528 में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने (विवादित जगह पर) एक मस्जिद का निर्माण कराया। बनाए गए बाबरी मस्जिद में तीन गुम्बदें थीं जिसे लेकर हिंदू समुदाय ने दावा किया कि यह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां एक प्राचीन मंदिर था। हिंदू पक्ष के मुताबिक मुख्य गुंबद के नीचे ही भगवान राम का जन्मस्थान था।

• सन1853 में इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए। 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई। असली विवाद शुरू हुआ 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं।
जिसके बाद यूपी सरकार ने विवादित जगह से मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट (डीएम) केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया।

• साल 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गईं जिसमें एक में रामलला की पूजा की इज़ाज़त और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इज़ाज़त मांगी गई और 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की। साल 1961 यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की।

• विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए साल 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमेटी गठित की। साल 1986 में यूसी पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज केएम पांडे ने 1 फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इज़ाज़त देते हुए ढांचे पर से ताला हटाने का आदेश दिया।

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• 1992 में वीएचपी और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़के गए, जिनमें 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। सन 2002 में हिंदू कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही ट्रेन में गोधरा में आग लगा दी गई, जिसमें 58 लोगों की मौत हो गई। इसकी वजह से गुजरात में दंगा हुआ और 2 हज़ार से ज्यादा लोग मारे गए।

• साल 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया लेकिन साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट का आह्वान किया और भाजपा के शीर्ष नेताओं पर आपराधिक साजिश के आरोप फिर से बहाल किए।

8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा। 1 अगस्त 2019 को मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की और 2 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा।

6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई। 16 अक्टूबर 2019 को अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी हुई लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया जिसमें 2.77 एकड़ विवादित जमीन हिंदू पक्ष को देने का फैसला लिया गया और मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया।

25 मार्च 2020 को तकरीबन 28 साल बाद रामलला टेंट से निकलर फाइबर के मंदिर में शिफ्ट हुए। 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का भूमि पूजन कार्यक्रम किया गया। पीएम नरेंद्र मोदी, आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और साधु-संतों समेत 175 लोगों को भूमि पूजन में आने का निमंत्रण दिया गया और अयोध्या पहुंचकर हनुमानगढ़ी में सबसे पहले पीएम मोदी ने रामलला के दर्शन किए और राम मंदिर के भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल हुए।

भूमि पूजन के बाद देश के हर कोने से राम मंदिर को बनाने के लिए फंड्स आने शुरू हो गए। राम मंदिर को बनाने के लिए अनुमानित रकम 1500 करोड़ रुपए आंकी जा रही थी परंतु इस फंडिंग में 2100 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम जमा हुई।

CAA/NRC:

caa nrc

11 दिसम्बर 2019 एक ऐसी तारीख़ जिसके बाद देश के कई कोनों में अफरा-तफ़री मच गई थी। यह तारीख है जिस दिन देश में CAA यानि नागरिकता संशोधन कानून आया था जिसके बाद से दिल्ली के शाहीन बाग़ और देश के कई अन्य हिस्सों में शाहीन बाग़ की तर्ज पर धरना प्रदर्शन किए गए। उत्तर प्रदेश में लखनऊ के घंटाघर अलीगढ़ विश्वविद्यालय और इलाहाबाद पार्क में मुस्लिम समुदाय द्वारा धरना प्रदर्शन किए गए।

नागिरकता संशोधन कानून पर देशभर में बवाल मचा था और इसका विरोध करने वाले इसे गैर-संवैधानिक बता रहे थे जबकि सरकार ने कई बार कहा था कि इसका कोई भी प्रावधान संविधान के किसी भी हिस्से की अवहेलना नहीं करता है। वहीं, इस कानून के जरिए धर्म के आधार पर भेदभाव का भी आरोप लगा था जिन आरोपों पर सरकार ने कहा था कि इसका किसी भी धर्म के भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, इन उलझनों के बीच देशभर में प्रदर्शन होने लगे और कई जगहों पर इसने हिंसक रूप भी अख्तियार कर लिया था। दरअसल, कई प्रदर्शनकारियों को लग रहा था कि इस कानून से उनकी भारतीय नागरिकता छिन जाएगी जबकि सरकार ने कई बार कहा कि यह कानून नागरिकता देने के लिए है, न कि नागरिकता छीनने के लिए। एक बड़ी आबादी को CAA और NRC में अंतर के बारे में ठीक से नहीं पता है। एनआरसी यानि नैशनल सिटिजन रजिस्टर के जरिए भारत में अवैध तरीके से रह रहे घुसपैठियों की पहचान करने की प्रक्रिया पूरी होनी है।

क्या है CAA?
इस नागरिकता संशोधन कानून के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बुद्ध धर्मावलंबियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

प्रदर्शन क्यों?
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दो तरह के प्रदर्शन हो रहे हैं। पहला प्रदर्शन नॉर्थ ईस्ट में हो रहा है जो इस बात को लेकर है कि इस ऐक्ट को लागू करने से असम में बाहर के लोग आकर बसेंगे जिससे उनकी संस्कृति को खतरा है। वहीं नॉर्थ ईस्ट को छोड़ भारत के शेष हिस्से में इस बात को लेकर प्रदर्शन हो रहा है कि यह गैर-संवैधानिक है। प्रदर्शनकारियों के बीच अफवाह फैली है कि इस कानून से उनकी भारतीय नागरिकता छिन सकती है। इनमें से बहुत से प्रदर्शनकारियों को तो यह तक नहीं पता था कि आख़िर CAA या NRC क्या है?

क्या CAA का भारत के मुसलमानों पर फर्क पड़ेगा?
गृह मंत्रालय यह पहले ही साफ कर चुका है कि CAA का भारत के किसी भी धर्म के किसी नागरिक से कोई लेना देना नहीं है। इसमें उन गैर मुस्लिम लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर भारत में शरण ले रखी है। कानून के मुताबिक, 31 दिसंबर, 2014 तक भारत आ गए इन तीन देशों के प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जाएगी परन्तु प्रदर्शनकारी इन बातों को समझने के लिए तैयार ही नहीं थे जिसके कारण देश में जगह-जगह पर प्रदर्शन जारी थे।

लखनऊ का घंटाघर और प्रयागराज पार्क का आंदोलन तो कोरोना के लॉकडाउन शुरू होने के बाद ही खत्म हो सका। सीएए और एनआरसी के खिलाफ लखनऊ में एक बड़ी हिंसा भी दिखी. यह हिंसा लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में फैली। 19 दिसंबर से 10 जनवरी तक चले हिंसा के इस दौर में 23 लोगों की जानें भी गईं। एंटी सीएए और एंटी एनआरसी के हिंसक प्रदर्शनों के बाद योगी सरकार ने बेहद ही कड़ा रुख अपनाया. हिंसा में शामिल लोगों की कथित पहचान सीसीटीवी के जरिए कराई गई और फिर सैकड़ों लोगों की तस्वीरें लखनऊ और दूसरे शहरों के चौक चौराहों पर टांग दी गईं। इसमें कई ऐसी अपराधिक चेहरे भी थे जिन्होंने भीड़ में फायरिंग की थी। कई ऐसे चेहरे थे जिन्होंने तोड़फोड़ की थी, मीडिया वैन जलाए थे, पुलिस पर हमले किए थे।

इसी बीच कुछ उपद्रवियों ने दिल्ली को अग्निमय करने की साज़िश रची और कामयाब भी रहे। दिल्ली सिर्फ दिल्ली नही बल्कि एक दहकती दिल्ली बन चुकी थी। अफरा तफरी का माहौल, खौफ, डर, यहाँ के लोगो के दिलों में घर कर बैठ गया था।

आइये जानते हैं कि आखिर में ये सब शुरू कबसे हुआ।

• 14 दिसंबर 2019 को सबसे पहले जंतर मंतर रोड पर CAA का विरोध किया गया था। बात यही से धीरे धीरे आगे बढ़नी शुरू हुई।
• 15 से 16 Dec को न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में 3 DTC बसों को आग लगाई गई।
इसके बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बच्चों पर भी साधारण सा CAA के ख़िलाफ़ बोलने पर दिल्ली पुलिस के द्वारा लाठी चार्ज किया गया।
• 17 Dec को दिल्ली के सीलमपुर इलाके में फिर से CAA प्रोटेस्ट को लेकर आम जनता और पुलिस के बीच झड़प हुई।
• 19 Dec को 20 मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया।
और तकरीबन 700 फ्लाइट्स डिलेड की गई।
• 20 Dec को JMI और शाहीनबाग़ मेट्रो स्टेशन पूरी तरह बंद रहे। क्योंकि वहाँ लगातार CAA विरोध में धरना प्रदर्शन चल रहा था।
• 21 Dec को भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद को दिल्ली पुलिस ने अरेस्ट किया दंगा भड़काने के आरोप में लेकिन फिर कोई ठोस सबूत न मिलने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई और 15 जनवरी को उन्हें रिहा कर दिया गया।
• 23 Dec को बहुत सारी जगहों पर प्रदर्शन किए गये। असम भवन के आगे भी प्रदर्शन किया गया।
• 24 Dec को पुलिस ने बहुत से यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को अरेस्ट किया।
• 14 Jan को सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से जंतर मंतर तक CAA , NRC और NPR के विरोध में रैली निकाली।
• 19 Jan को शाहीनबाग़ और JMI में एक बार फिर एक जोरदार CAA NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट किया गया।

• 24 Feb को जाफराबाद , मौजपुर के साथ साथ पूरी नार्थ दिल्ली में ही एक बार फिर से हिंसा की लहर दौड़ पड़ी।
यह हिंसा 25 को भी जारी रही और इसमें 20 लोगो की मौत तथा तकरीबन 250 लोग घायल हुए। उसके बाद यूपी (लखनऊ) के नदवा में मची मारकाट के बाद, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम खुलकर सामने आया, उसके तमाम विश्वासपात्रों को यूपी पुलिस ने हिरासत में भी लिया। इन खुफिया रिपोर्ट्स के हासिल होने के बाद से हिंदुस्तानी हुक्मरानों के भी कान खड़े हो गए हैं।

हिंदुस्तानी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर पड़ताल में दिन-रात जुटी दिल्ली पुलिस की क्राइम-ब्रांच ने भी अपने ‘रडार’ पर दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर, ओखला, शाहीन बाग, बाटला हाउस को लिया जिसमें दिल्ली के जामिया इलाके को 15 दिसंबर को सबसे पहले आग में झोंके जाने जैसी बातें खुफिया रिपोर्ट्स और जांच एजेंसियों के सामने निकल कर आ चुकी थीं। इन खुफिया रिपोर्ट्स से सरकार को मालूम हुआ कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) कैसे ज्यादा मेहनत-मशक्कत किए बिना ही देश को तोड़ने और राष्ट्रीय संपत्ति को नेस्तनाबूद करने का ताना-बाना बुनती है? उसके इस काम में सबसे मजबूत कंधे के रूप में काम आते हैं कुछ गुमराह युवा और विद्यार्थी।

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच के कुछ आला-अफसरों की बात मानी जाए तो, ’15 दिसंबर 2019 को जामिया नगर इलाके में फसाद शुरू होने से एक-दो दिन पहले ही इस इलाके में करीब 150 से ज्यादा युवा 10-10 और 20-20 की टोलियों में दिल्ली राज्य की सीमा रेखा के बाहर से आकर छिप चुके थे। इनमें से अधिकांश की औसत आयु 16 से 30 के बीच रही होगी। अधिकांश देखने में विद्यार्थी से लग रहे थे। तब तक दिल्ली को हिंसा की आग में झोंकने की किसी को कानो कान खबर नहीं थी। दो दिन बाद ही यानी 15 दिसंबर को दोपहर के वक्त खूनी हिंसा शुरू हो गयी। उस आगजनी-पथराव में भी इसी उम्र-हुलिये के अधिकांश नौजवान पथराव करते दिखाई दे रहे हैं। जांच एजेंसियों की इस बात को हिंसा वाले दिन के सीसीटीवी फुटेज भी बयान करते हैं। अगर दिल्ली अला अफ़सरों की माने तो इस कांड में शामिल होने वालों की शिनाख्त करने के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर उनपे कार्यवाही की जा रही है।

इस तरह के बड़े छोटे हमले, कांड, आगजनी, मारकाट आदि में शामिल होने वालों के पोस्टर लगवाए थे। सरकार ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं के पोस्टर भी चौक चौराहे पर लगवाए थे। इन सभी पर प्रोटेस्ट का साथ देने और भीड़ का हिस्सा बनने का आरोप था। इन सभी लोगों से नुकसान की वसूली के लिए अभियान भी चलाया गया। लखनऊ, कानपुर, अलीगढ़ जैसे शहरों में तो ऐसे प्रोटेस्टर्स जिनका नाम या जिनकी तस्वीरें सीसीटीवी में आई उनसे क्षतिपूर्ति भी वसूली गई और यह रकम लाखों में थी। लखनऊ में 19 दिसंबर 2019 को सीएए और एनआरसी कानून के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान जमकर हंगामा हुआ था और लखनऊ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में कई जगह गाड़ियां जला दी गई थी और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था।

किसान आंदोलन :

कृषक आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है और विश्व के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने खेती की नीतियों में परिवर्तन करने के लिये आन्दोलन किये हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके। मौजूदा दौर में भारत में किसान आंदोलन तेज गति से बढ़ रहे है इसका मुख्य कारण किसानों की आर्थिक हालत दिन प्रति दिन कमजोर हो रही है और वो कर्ज के जाल में मकड़ी की तरह फंस रहा है क्योंकि वर्तमान समय में खेती में लागत बढ़ रही है जिसके मुताबिक आमदनी घट रही है जिस कारण से किसानों में आत्म हत्या की घटनाए बढ़ रही हैं।

वर्तमान समय मे जो किसान आंदोलन चल रहा है वह तीन नए कृषि कानून के विरोध में चल रहा है।

• पहला है ”कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020”

इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है। किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे लेकिन सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है। इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है। बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं।

क्‍या होगा असर?
यही खुली छूट आने वाले वक्त में एपीएमसी मंडियों की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी एपीएमसी मंडी के बाहर नए बाजार पर पाबंदियां नहीं हैं और न ही कोई निगरानी। सरकार को अब बाजार में कारोबारियों के लेनदेन, कीमत और खरीद की मात्रा की जानकारी नहीं होगी। इससे खुद सरकार का नुकसान है कि वह बाजार में दखल करने के लिए कभी भी जरूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर पाएगी।

इस कानून से एक बाजार की परिकल्पना भी झूठी बताई जा रही है। यह कानून तो दो बाजारों की परिकल्पना को जन्म देगा एक एपीएमसी बाजार और दूसरा खुला बाजार दोनों के अपने नियम होंगे खुला बाजार टैक्स के दायरे से बाहर होगा।

सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं लेकिन सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है। यह तर्क और तथ्य बिल्कुल सही है कि मंडी में पांच आढ़ती मिलकर किसान की फसल तय करते थे। किसानों को परेशानी होती थी लेकिन कानूनों में कहीं भी इस व्यवस्था को तो ठीक करने की बात ही नहीं कही गई है।

• दूसरा कानून है ”कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020”

इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है। इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है।

आप की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा। यह तो किसानों को बंधुआ मजदूर बनाने की शुरुआत जैसी है चलिए हम मान लेते हैं कि देश के कुछ किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चाहते हैं लेकिन कानून में किसानों को दोयम दर्जे का बना कर रख दिया गया है।

सबसे अधिक कमजोर किसानों को कॉन्‍ट्रैक्ट फार्मिंग में किसान और ठेकेदार के बीच में विवाद निस्तारण के संदर्भ में है। विवाद की स्थिति में जो निस्तारण समिति बनेगी उसमें दोनों पक्षों के लोगों को रखा तो जाएगा लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पूंजी से भरा हुआ इंसान उस समिति में महंगे से महंगा वकील बैठा सकता है और फिर किसान उसे जवाब नहीं दे पाएगा। इस देश के अधिकतर किसान तो कॉन्ट्रैक्ट पढ़ भी नहीं पाएंगे।

• क‍ितना समर्थ है क‍िसान?
कानून के अनुसार पहले विवाद कॉन्‍ट्रैक्‍ट कंपनी के साथ 30 दिन के अंदर किसान निपटाए और अगर नहीं हुआ तो देश की ब्यूरोक्रेसी में न्याय के लिए जाए, नहीं हुआ तो फिर 30 दिन के लिए एक ट्रि‍ब्यूनल के सामने पेश हो। हर जगह एसडीएम अधिकारी मौजूद रहेंगे। धारा 19 में किसान को सिविल कोर्ट के अधिकार से भी वंचित रखा गया है। कौन किसान चाहेगा कि वह महीनों लग कर सही दाम हासिल करे? वह तहसील जाने से ही घबराते हैं। उन्हें तो अगली फसल की ही चिंता होगी।

• तीसरा कानून है ”आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020”. यह न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आम जन के लिए भी खतरनाक है।

अब कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी। उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी। सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है? खुली छूट। यह तो जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है। सरकार कानून में साफ लिखती है कि वह सिर्फ युद्ध या भुखमरी या किसी बहुत विषम परिस्थिति में रेगुलेट करेगी।

सिर्फ दो कैटेगोरी में 50% (होर्टिकल्चर) और 100% (नॉन-पेरिशबल) के दाम बढ़ने पर रेगुलेट करेगी नहीं बल्कि कर सकती है कि बात कही गई है।

सरकार कह रही है कि इससे आम किसानों को फायदा ही तो है। वे सही दाम होने पर अपनी उपज बेचेंगे. लेकिन यहां मूल सवाल तो यह है कि देश के कितने किसानों के पास भंडारण की सुविधा है? हमारे यहां तो 80% तो छोटे और मझोले किसान हैं।

आवश्यक वस्तु संशोधन कानून, 2020 से सामान्य किसानों को एक फायदा नहीं है। इस देश के किसान गोदाम बनवाकर नहीं रखते हैं कि सही दाम तक इंतजार कर सकेंगे। सरकारों ने भी इतने गोदाम नहीं बनवाएं हैं। किसानों को अगली फसल की चिंता होती है, तो जो बाजार में दाम चल रहा होगा उस पर बेच आएंगे लेकिन फायदा उन पूंजीपतियों को जरूर हो जाएगा जिनके पास भंडारण व्यवस्था बनाने के लिए एक बड़ी पूंजी उपलब्ध है। वे अब आसानी से सस्ती उपज खरीद कर स्टोर करेंगे और जब दाम आसमान छूने लगेंगे तो बाजार में बेचकर लाभ कमाएंगे।

• ज‍िम्‍मेदारी से बचना चाहती है सरकार?
सच तो यह है कि आज सरकार अपनी जि‍म्मेदारी से भाग रही है। कृषि सुधार के नाम पर किसानों को निजी बाजार के हवाले कर रही है। हाल ही में देश के बड़े पूंजीपतियों ने रीटेल ट्रेड में आने के लिए कंपनियों का अधिग्रहण किया है। सबको पता है कि पूंजी से भरे ये लोग एक समानांतर मजबूत बाजार खड़ा कर देंगे। बची हुई मंडियां इनके प्रभाव के आगे खत्म होने लगेंगी। ठीक वैसे ही जैसे मजबूत निजी टेलीकॉम कंपनियों के आगे बीएसएनल समाप्त हो गई। इसके साथ ही एमएसपी की पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। कारण है कि मंडियां ही एमएसपी को सुनिश्चित करती हैं फिर किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचेगा। सरकार बंधन से मुक्त हो जाएगी।

कोरोना महामारी में सिस्टम फ़ेल:

कोरोना महामारी की शुरुआत चीन के वुहान से हुई, और भारत मे कोविड का पहला केस दक्षिण भारतीय राज्य केरल में मेडिकल की पढ़ाई करने वाली 20 साल की एक लड़की थी जो भारत में कोरोना वायरस से पॉजिटिव पाई गई। वह तीन सालों से वुहान में मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी वुहान में कोविड तेजी से फैल रहा था जिसके कारण उसके कॉलेज की छुट्टियाँ हो गयी थीं और वह फ्लाइट बुक करके कोलकाता आ गयी फिर उसने वहां से कोच्चि की फ्लाइट ली।

इस तरह से कई लोग वुहान और चीन की अन्य जगहों से वापस आए और भारत मे धीरे धीरे कोविड-19 के केसेज़ मिलने लगे। जो भारतीय लोग चीन में ही फंस गए थे, सरकार ने उन्हें फ्लाइट भेजकर वापस अपने देश बुला लिया। उन सब की स्क्रीनिंग की गई और बहुत से लोग कोविड पॉजिटिव निकले और केसेज़ में इज़ाफ़ा होता गया।

• कोविड का पहला सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बना दिल्ली-
निजामुद्दीन मरकज के तबलीगी जमात में शामिल लोगों में से कई में जानलेवा कोरोना वायरस की पुष्टि ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। मरकज़ उस वक़्त कोरोना वायरस हॉटस्पॉट के रूप में उभरा, जब धर्मिक सभा में शामिल हुए 24 लोग कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए।

क्राइम ब्रांच ने 955 विदेशी जमातियों के ख़िलाफ़ विदेशी अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम, महामारी रोग अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत मुक़दमा दर्ज किया।

दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि इन्होंने टूरिस्ट वीज़ा के ज़रिए भारत में प्रवेश किया और मरकज़ में हुए कार्यक्रम में हिस्सा लिया। पुलिस ने यह भी कहा कि इन विदेशी नागरिकों ने वीज़ा प्रावधानों का उल्लंघन करने के अलावा एक ऐसी स्थिति बनने दी, जिससे संक्रामक बीमारी फैली और मरकज़ में मौजूद लोगों के साथ-साथ आम जनता के जीवन के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया।

सोशल मीडिया पर जो चीत्कार उठ रही है उसके खिलाफ सरकार की सक्रियता के सबूत और रुझान भी आने लगे हैं – और इस बीच सरकारी फरमान पर ट्विटर ने ऐसे कई ट्वीट डिलीट किये हैं जो सिस्टम के फेल होने को लेकर आवाज उठा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात के बीच होम आइसोलेशन से ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने ट्वीट किया है – ‘सिस्टम फेल हो गया है.’

सवाल है कि सिस्टम क्यों फेल हो गया है – और फेल हुआ भी है तो कौन जिम्मेदार है? किसी न किसी की तो जिम्मेदारी बनती ही होगी?

जो सिस्टम फेल हुआ है वो किसका बनाया हुआ है – क्या ये जवाहर लाल नेहरू का बनाया सिस्टम है? नेहरू ने तो योजना आयोग बनाया था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे खत्म कर एक नया नीति आयोग बनाया है। नीति आयोग के ही सदस्य डॉक्टर वीके पॉल कोविड संकट में स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से निगरानी भी कर रहे हैं – और हर वक्त यथाशक्ति सलाह भी दे रहे हैं।

क्या ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस की वजह से सिस्टम फेल हुआ है या फिर कोविड से पैदा हुए हालात ने सिर्फ सिस्टम से पर्दा भर उठाया है?

एहतियात में क्या कमी?
ये मेडिकल साइंस का ही सूत्र वाक्य है – ‘रोगों की रोकथाम, इलाज से बेहतर होता है.’ ठीक वैसे ही जैसे कानून व्यवस्था कायम रखने के लिए एहतियाती तौर पर धारा 144 लागू कर दी जाती है। कोरोना वायरस के फैलाव पर काबू पाने के मकसद से धारा 144 तो महाराष्ट्र में भी लागू की गयी, लेकिन बहुत कुछ नुकसान हो जाने के बाद।

जब चारों तरफ ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा है तो प्लांट लगाने की खबरें भी आ रही हैं। अभी अभी पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार से वक्त निकाल कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में भी ऑक्सीजन प्लांट का उद्घाटन करने गये थे – और भरोसा भी दिलाया कि जब ऑक्सीजन का उत्पादन होने लगेगा तो गुजरात की जरूरत पूरी होने के बाद दूसरे राज्यों में भी आपूर्ति की कोशिश होगी।

एक गुड न्यूज ये भी है कि केंद्र सरकार ने ऑक्‍सीजन की जरूरी उपलब्‍धता सुनिश्चित कराने के लिए 551 ऑक्‍सीजन प्‍लांट स्‍थापित करने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ट्वीट करके ये जानकारी दी है।

कब तक होगी ऐसी घटिया राजनीति?

प्रधानमंत्री ने कहा है कि ये प्लांट जल्द से जल्द शुरू कराया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने उम्मीद जतायी है कि इस महत्वपूर्ण कदम से अस्पतालों में ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ेगी और देश भर के लोगों को मदद मिलेगी।

ऑक्सीजन के घोर अभाव को लेकर सबसे ज्यादा परेशान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ मीटिंग में भी केजरीवाल ने ये मामला उठाया था। दिल्ली के कई अस्पताल भी ऑक्सीजन को लेकर सरकारी मदद न मिल पाने की स्थिति में हाईकोर्ट गये हुए हैं। ऑक्सीजन की स्थिति सुनने के बाद तो सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की पीठ ने यहां तक कह डाला कि ऑक्सीजन की सप्लाई में कोई बाधा बना तो उसके लटका देंगे – और वो कोई भी हो।

अरविंद केजरीवाल के ऑक्सीजन के अभाव का मुद्दा उठाये जाने के बाद असम के स्वास्थ्य मंत्री हिमंता बिस्व सरमा की तरफ से जवाब आया है। असल में अरविंद केजरीवाल कह रहे थे कि दिल्ली में ऑक्सीजन प्लांट नहीं है इसलिए दिक्कत ज्यादा है।

ट्विटर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री को टैग करते हुए असम के मंत्री ने बताया है कि दिसंबर, 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली को पीएम केयर्स के तहत 8 प्लांट लगाने के लिए फंड मुहैया कराया था, लेकिन आपकी सरकार फेल रही और 8 में से सिर्फ 1 ही लगा सकी – फिर PM मोदी को दोष क्यों दे रहे हैं?

पंचायती राज दिवस के एक डिजिटल आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हर सूरत में गांवों तक संक्रमण पहुंचने से रोकना होगा। मालूम होना चाहिये कि अब ये रोकने से भी नहीं रुकने वाला – क्योंकि गांवों को भी कोविड अपने संक्रमण की चपेट में पहले ही ले चुका है।

हो सकता है ये सिस्टम की ही खामी हो जो प्रधानमंत्री मोदी तक जमीनी हकीकत नहीं पहुंच पा रही है। बनारस, लखनऊ, कानपुर या प्रयागराज जैसे शहरों में ऑक्सीजन और बेड के लिए जो मारा-मारी मची है वे लोग सिर्फ उन शहरों के बाशिंदे ही नहीं हैं, बल्कि दूरदराज के गांवों के अस्पतालों से भेजे हुए मरीज और उनके परिवार के लोग और रिश्तेदार हैं – और जो दिखायी दे रहे हैं वे ही सभी आने वाले नहीं हैं क्योंकि ऐसे कई मरीज हैं जो शहर पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ दे रहे हैं।

कितने ज़रूरी थे पंचायत चुनाव?
कोरोना काल में जो पंचायत चुनाव हुए वो ओइटने ज़रूरी थे, क्या ये चुनाव थोड़ा रुककर नहीं कराए जा सकते थे? क्या लोगों की जान इतनी सस्ती थी कि चुनाव के नाम पर उनकी बलि दी गयी। पंचायत चुनाव में बे-रोकटोक आए प्रवासियों की वजह से गांव में कोरोना का विस्फोट हुआ और बहुत से शिक्षक जिनकी कोरोना काल मे चुनाव के समय ड्यूटी लगी उनमें 200 से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा दी लेकिन सरकार के मुताबिक इन शिक्षकों के मरने का आंकड़ा सिर्फ 3 है। स्थिति यह है कि गांवों में न के बराबर दिखने वाला कोरोना संक्रमण अब 40-60 फीसदी के उछाल पर है। खांसी-बुखार के मरीजों की भी बढ़ोतरी हो रही है। फिजिशन डॉ. सुधाकर के मुताबिक पंचायत चुनाव ने कोरोना स्प्रेडर की भूमिका निभाई है। गांवों में कोरोना के केस चुनाव के बाद से बढ़ने लगे हैं। जो मतदान कार्मिक गांवों में मतदान करवाने आए, उनकी कोरोना जांच नहीं हुई।

बंगाल चुनाव के बाद कोरोना विस्फोट:
देश के सभी विशेषज्ञ ये लगातार चेतावनी दे रहे थे कि 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद कोविड-19 की स्थिति विस्फोटक हो जाएगी। पश्चिम बंगाल में हालात को लेकर सब ने चिंता और चेतावनी जाहिर की थी परन्तु नेताओं ने इस बात पर गौर नहीं किया और चुनावी रैलियां उनमे जमा हुई भीड़ जिनमें अधिकतम लोगों ने मास्क तक नहीं लगाया था और न ही कोई उचित दूरी थी। यहां तक कि भाषण देने वाले नेताओं ने भी सोशल डिस्टेंस और कोविड प्रोटोकोल्स की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। गृहमंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रैलियों में सबसे अधिक भीड़ देखने को मिली और बंगाल में यही कोविड विस्फोट की असल ज़िम्मेदार हैं।

आठ चरणों वाला पश्चिम बंगाल का लंबा विधानसभा चुनाव खत्म हो चुका है और ममता बनर्जी तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुकी हैं। चुनाव खत्म होते ही कोरोना वायरस संक्रमण के रुझान आने लगे और हर रोज संक्रमित मरीजों के आंकड़े बढ़ रहे हैं तो मरने वालों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई।

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