जानिए क्यों हरियाणा के जाट और राजस्थान के गुर्जर लोगों की जान है देशी हुक्का ?

0
2636
hukka is love

प्राचीन समय से यह हुक्का हरियाणवी संस्कृति की शान रहा है प्रदेश के गांव में हुक्का बड़े बूढ़े लोगों की जान हुआ करता था और इसको अभी भी लोग शान से पीते हैं खासकर गांव में रहनेवाले। यह बात कहनी तो बहुत मुश्किल है कि हुक्के का जन्म कब और कहां हुआ था फिर भी सूत्रों के मुताबिक यह कहीं ना कहीं हमारी आस्था और संस्कारों की बहुत बड़ी पहचान रहा है हमारा हुक्का। वैसे तो हुक्के से जो धुआं निकलता है वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है लेकिन फिर भी वह हमारे हरियाणा प्रदेश में एक भाईचारे की बहुत बड़ी शान माना जाता है। अनुमान लगाया जाए तो मनुष्य की जिंदगी की पहली सच्चाई आग, हवा और पानी है। आखिरी में देखा जाए तो यही हवा, आग पानी हमारे हुक्के में भी पाया जाता है जिनसे मिलकर हमारा हुक्का बनता है।

क्यों बढ़िया है हमारा हरियाणवी हुक्का :-

हरियाणा प्रदेश के गांव में आग और पानी को देवता कहा जाता है और हमारे हुक्के में इन दोनों का वास होता है और समझदार मनुष्य तो इसकी इज्जत करेगा ही | हुक्के की अपनी एक अलग पहचान होती है।हुक्का पीने और भरने के लिए एक अलग नियम और कानून होते हैं मौजूदा लोगों में जो सबसे कम उम्र का व्यक्ति होता है या जिसके घर आप जा रहे होते हो तो उसका एक दायित्व बनता है हुक्का भर कर देने का और जो सबसे बड़ी उम्र का व्यक्ति होता है सबसे पहली घूंट उसको भरनी होती है| मुख्य तौर पर देखा जाए तो हुक्का प्रदेश की शान है अपितु बड़े बूढ़ों का भी मान है|

घर की खुशहाली और इज्जतदार घर की निशानी माना जाता है हुक्का :-

आए गए मेहमान को जब तक ताजा हुक्का भरके ना पिलाएं तब तक वह अपनी बेइज्जती महसूस करता है, सौ बात की एक बात हुक्का मान-सम्मान की निशानी है आपस की लड़ाई को भूलकर हुक्का पीने बैठ जाना हमारे भाईचारे की निशानी है| किसी की जिंदगी में खुशी और गम की शुरुआत और अंतिम पल हुक्के के बिना अधूरे हैं।
हुक्के के चारों तरफ बैठ कर घर के और गांव के सारे झगड़ों पर विचार-विमर्श किया जाता है और उसे सुलझाया जाता है।
सच और झूठ का पता लगाने के लिए हुक्के की कसम दिलवाकर बात की पुष्टि की जाती है और जिस व्यक्ति के मन में खोट होता है और जो गांव की रीति रिवाजों को नहीं मानता उस व्यक्ति का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है हमारे बड़े बूढ़ों द्वारा किसी सच्ची बात का पता लगाने के लिए व्यक्ति का हाथ हुक्के पर रखवा के उसकी कसम दिलवाई जाती है यह भी एक कारण है कि गांव में हुक्का पंचायत की शान माना जाता है|

पहले हुक्के मिट्टी और लकड़ी के बनाए जाते थे आजकल तो लोहे और पीतल की धातु के चल रहे हैं।flavoured hukka

मिट्टी और लकड़ी वाले हुक्के में पानी बहुत देर तक ठंडा रहता है मतलब पानी बार-बार बदलने की जरूरत नहीं पड़ती है हुक्के पर रखी हुई चिलम में तंबाकू डाल के उस पर एक मिट्टी का बर्तन जैसे कोई छोटा सा दीवा या कोई टेकरा आगे रखा जाता है और तंबाकू गर्म होने के बाद जो धुआ पानी में से फिल्टर होने के बाद खींचने वाली नाली में से बाहर आता है| उस धुएं में निकोटिन पाया जाता है वह मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक नहीं होता है|

हुक्के की देशी तंबाकू को बहुत मेहनत से तैयार किया जाता है, तंबाकू के पौधे को सुखाकर फिर उसको कूटकर फिर उसमें गुड़ मिलाया जाता है और वह गुड़ निकोटिन की मात्रा को कम करने के लिए मिलाया जाता है थोड़ा तंबाकू डाला हुआ बहुत देर तक चलता है हमारे बड़े बूढ़े कह कर गए हैं डालोगे पूरा मिलेगा दुगना आज भी गांव में सुबह से लेकर शाम तक व्यक्ति को बेशक से एक समय की रोटी ना प्राप्त हो लेकिन वह हुक्का पिए बिना नहीं रह सकता है। आजकल तो कुछ रह नहीं गया है जो पहले बात होती थी। पहले गांव की औरतें घूंघट करती थी हमारी दादी अम्मा और ताई जी बताया करती हैं हुक्का अगर रखा हो और वहां कोई व्यक्ति बैठा हो या ना बैठा हो पर हमेशा यह रहता था कि हुक्के को रखा देख कर औरतें घूंघट कर लेती थी। जब हुक्के का पानी बदलना होता था तो इतनी तवज्जो दी जाती थी कि उस पानी को किसी ख़ास जगह पर खाली करके रखा करते थे ताकि उस पानी पर किसी का पैर ना लगे। भाई लोगों आजकल वह टाइम नहीं रहा है जो पहले हुक्के को मान सम्मान दिया जाता था आजकल तो उसका हास्य उड़ाया जाता है अर्थात उसको एक मजाक के रूप में लिया जाता है।

हुक्का पीने वाले बहुत हो गए पर पीना किसी को नहीं आता मतलब पीने वाले बहुत हैं लेकिन उसका मान सम्मान और जो प्रतिष्ठा पहले दी जाती थी वह आज के समय में उसे नहीं दी जाती है आजकल कुछ भी हिसाब-किताब नहीं रहा है जो पहले होता था बड़े छोटे की शर्म नहीं रही है हुक्का तो फिर भी एक निर्जीव वस्तु है और कम उम्र के बच्चे आजकल हुक्का पीने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।

यह लेख 1 हरियाणवी वेबसाइट kasootnews.com पर प्रकाशित हरियाणवी भाषा का हिंदी अनुवाद है जिसको लिखा है सतीश खत्री ने और राष्ट्रहित के लिए हिंदी में इसे अनुवादित किया है राष्ट्रहित के मित्र सौरव शर्मा ने |
आप इस लेख को हरियाणवी भाषा में यहाँ पढ़ सकते हैं :

क्‍यों एंडी स म्हारा हरियाणवी होक्का

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here